अंचल में भुजरिया पर्व परंपरागत तरीके से मनाया

बागली (सुनील योगी)- बागली सबडिवीजन मालवा एवं निर्माण की संस्कृति से मिलाजुला क्षेत्र है यहां पर अधिकतर बड़े गांव और पंचायत आदिवासी बाहुल्य तथा मजदूर वर्ग बस्ती वाली है !यहां पर आज भी परंपरागत पर्व जो संस्कृति से जुड़े हुए हैं! उन्हें इमानदारी से मनाया जाता है ! इस क्षेत्र में रक्षाबंधन के एक दिन बाद ही भुजरिया पर्व परंपरागत तरीके से मनाया गया, इस पर्व में कई परिवार मान मन्नत करते हुए अपने घरों पर 7 से 12 दिन पूर्व से विशेष टोकरी (बांस की टोकरी) मे नदी किनारे से मिट्टी लाकर गेहूं के बीज डालकर उगाते हैं! जिसे स्थानीय भाषा में ज्वारा कहते हैं! निश्चित दिनों की अवधि में यह हरे भरे हो कर गमले नुमा आकर्षक हो जाते हैं! विधि विधान से इन्हें घर में पूजा घर स्थान पर रखकर पूजा पाठ की जाती है! तथा गुड एवं घी की धूप दी जाती है ! बाद में कुंवारी लड़कियां एवं महिलाएं इसे सिर पर रखकर गांव की प्रमुख गलियों में निकलती है! साथ में परिवार के कई सदस्य और ग्रामीण समाज के लोग भी रहते हैं !इसे बीच स्थान में रखकर इसके आसपास गीत गाकर ईश्वर से क्षेत्र में धन-धान्य परिपूर्ण रहे और आसमानी आफत से सुरक्षा बनी रहे ,इस प्रकार की कामना करते हुए लोक संस्कृति गीत गाए जाते हैं! बाद में समीप में बह रही नदिया पारंपरिक जल स्त्रोत पर जाकर इसे ठंडा कर दिया जाता है ! ईस दिन प्रत्येक घर में मिठाई के रूप में कुछ न कुछ पकवान बनाए जाते हैं ! वर्षों पुरानी यह परंपरा समाज को एक दूसरे से जोड़ती है विशेषकर आदिवासी समुदाय में भुजरिया पर्व का उत्साह बहुत रहता है!
विधायक ने दी सभी को बधाई
भुजरिया पर्व पर बागली के विधायक पहाड़ सिंह कन्नौजे ने सभी क्षेत्रवासियों को बधाई देते हुए कहा कि लोक संस्कृति से जुड़ी यह परंपरा आज भी समाज को जोड़ने का काम करती है परिवार के सदस्य बाहर काम करने गए हो तो भी इस दिन परिवार के बीच में आ जाते हैं