सुन्द्रेल बिजवाड(दीपक शर्मा)। एक बार उस परमात्मा पर भरोसा कर के तो देखो, फिर वह आपकी हर एक महफ़िल के रंग न बदलते तो कहना, क्योंकि भरोसा करने के बाद उसकी अपनी जवाबदारी हो जाती हैं कि मेरे भक्त पर किसी प्रकार की आपत्ति न आ जाये और हम जीवनपर्यंत निश्चित हो जाते हैं। उक्त वचन भागवाताचार्य श्री पवनकृष्ण जी शर्मा ने श्री मद्द्भागवत कथा के छठे दिवस में बज्जाहेड़ा में कहे। आपके द्वारा बताया गया कि नरसिह मेहता जी ने यही एक सच्ची भक्ति की थी और उसका नाम था विश्वास। उसके बाद उनको जीवन भर पीछे मुड़ कर न देखना पड़ा और उनकी यश कीर्ति के गुण आज भी शास्त्रों में गाया जा रहा हैं। नारी शक्ति की गाथा सुनाते हुए बताया गया कि नारी एक नहीं दो-दो कुलों का उद्धार करती हैं उनका अपना पूरा जीवन दूसरें को समर्पित रहता हैं। शर्मा जी द्वारा कहा कि हाथ जोड़कर हर समाज से निवेदन हैं कि बेटी का रिश्ता करते समय कारोबार बिल्कुल न देखना, सिर्फ और सिर्फ संस्कार देख लेना, यदि परिवार में संस्कार हैं तो जीवनपर्यंत उसकी तरफ देखने की जरूरत नही हैं। क्योंकि आज समाज में बेटियां अपने आपको असहाय महसूस कर रही हैं क्योंकि हमारे द्वारा जो व्यहार अपनाया जा रहा हैं वह परिवार की परिपाठी से उपयुक्त नहीं हैं, जो बेटी पिता के घर रहकर पल-पल पिता जी के लिये खुशी के मोती पिरोए रहती हैं वही बेटी यदि ससुराल में दर्द महसूस करती हैं वह पिता जिंदगी भर खून के आंशू बहाता रहता हैं। हमारे कुल-गोत्र व परिवार में हमारे कर्म से यदि किसी की भी आंखों में आँसू आते हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य होगा, कर्तव्यों की ऐसी महिमा होना चाहिए कि हमारे कर्म से सामने वालों को सुखों की अनुभूति हो
