पं. मिश्रा जी के आव्हान से बैशाख शिवरात्रि पर शिवालयों में उमड़े श्रद्धालू, आज है सातूडी अमावस, खूब बटेगा सत्तू जाने सत्तू को खाने के तरीके

देवास। 29 अप्रैल, शुक्रवार को बैशाख शिवरात्रि पर शहर के हर छोटे बडे शिवालयों में श्रद्धालूओं का प्रात: से दोपहर तक तांता लगा रहा। बड़ी संख्या में बडे जनों के साथ छोटे छोटे बच्चे भी जल का लौटा भर, उसमे पुष्प, कंकु, अक्षत, धतुरा इत्यादि डालकर शिवलिंग का जलाभिषेक करने कलश भरकर पंहुचे।

दरअसल विगत दिवस शिव महापुराण कथा के दौरान सिहोर वाले गुरूजी प्रख्यात कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा जी वैशाख शिवरात्रि का महत्व बताते हुए आव्हान किया था कि इस पवित्र दिन शिवलिंग का जलाभिषेक करने से जीवन निरोगी रहता है, संकट टलते है। परेशानियों का अंत होता है, जीवन सुखी, समृद्ध होता है। पूज्य मिश्रा जी ने जलाभिषेक के लिये कुछ आवश्यक सामग्री भी बतायी थी। श्रद्धालुओं द्वारा दो तीन दिन पूर्व से ही इन सामग्रियों को जूटाया जा रहा था। बाजार में लौटे के बराबर 10 रूपये वाला मिट्टी का कलश 30 से 35 रूपये में विक्रय किया गया। इसी प्रकार शिवजी को प्रिय धतुरे के दाम भी बड़े हुए रहे। यही नहीं पं. मिश्रा जी के आव्हान पर सत्तु की खरीदारी भी जमकर हुई। गौरतलब है कि पुराने समय में सत्तु की विशेष पहचान थी। गर्मी के दिनो में इसका सेवन विशेषकर किया जाता था। सत्तु सेवन के साथ भगवान को भी चढ़ाया जाता है। पहले जब श्रद्धालू तीर्थयात्रा पर जाते थे तो सत्तु बांधकर ले जाते थे। भूख लगने पर सत्तु को शकर में घोलकर सेवन करते थे। धीरे धीरे इसकी पहचान लुप्त होती जा रही थी आज की नई पीडी को सत्तू क्या है मालूम ही नहीं है। यह सत्तू सीके अनाज गेहूं, जौं, चना का शुद्ध मिश्रण है। लेकिन सिहोर वाले गुरूजी के आव्हान पर पिछले दिनो से सत्तु का नाम लोगो की जबान पड़ चढ़ा हुआ रहा।

• सत्तू को खाने के तरीके: सत्तू को शकर और पानी के साथ मिलाकर खाया जाता है, शकर और दूध के साथ मिलाकर खाया जाता है। इसमें शकर पानी के साथ कैरी पुदीने की चटनी मिलाकर खट्टे मीठे स्वाद में भी खाया जाता है। साथ ही अतिरिक्त रूप से दंही या रबड़ी मिलाकर भी उपयोग में लिया जाता है। मधुमेह वाले लोग इसमें शक्कर की जगह शुगर फ्री का उपयोग भी कर सकते हैं।