प्रभु ने पीड़ा को स्वीकारा लेकिन पीड़ा देने वाले को ना धिक्कारा बड़ा व्यक्ति लोगो की जीभ पर, लेकिन महान व्यक्ति हृदय में प्रतिष्ठित होते है – पं. गौरांग भाई
देवास। श्री शंखेश्वर पाश्र्वनाथ मंदिर तुकोगंज रोड पर 9 सितम्बर को भव्य स्नात्र महोत्सव का आयोजन हुआ। इसके अंतर्गत मेरू पर्वत संरचना, छप्पन दिग्कुमरी संरचना सहित भक्ति भावना के दिव्य सौपान के साथ स्नात्र महोत्सव मनाया गया। स्नात्र महोत्सव जो कि एक वार्षिक कर्तव्य है उसे समाजजनों ने अपने घरों से बड़ी संख्या में फल, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री लाकर प्रभु चरणों में समर्पित कर झूमते नाचते गाते हुए इस स्नात्र महोत्सव में सम्मिलत हुए। स्नात्र महोत्सव का लाभ वसंतकुमार पूरालाल जैन गंगधार वाला परिवार ने प्राप्त किया। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा को उपदेशित करते हुए गौरांग भाई ने कहा कि सभी तीर्थंकर अपने स्वयं की सहायता से ही अपने कर्मो की निर्जरा करते है। परम शक्तिशाली परमात्मा के जीवन में भी घोर कष्ट आये। लेकिन वे सम-भाव एवं शांत भाव से पीड़ा सहन करते रहे। प्रभु जानते थे पूर्व जन्म के कर्मानुसार कष्ट तो भोगने ही पड़ेगे। ये भोगावली कर्म ही है। प्रभु ने पीड़ा को भी स्वीकारा लेकिन पीड़ा देने वाले को कभी ना धिक्कारा। प्रभु रागी से वैरागी तथा वैरागी से वीतरागी बने। हमें भी प्रभु के सच्चे अनुयायी बनकर इसी मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। चौबीसो तीर्थकरो के जीवन चारित्र का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। श्री ऋषभदेव भगवान से लेकर शांतिनाथ भगवान, नेमीनाथ भगवान, पाश्र्वनाथ भगवान एवं महावीर स्वामी के जीवन सार को प्रस्तुत किया। आपने कहा कि इन तीर्थंकरो का जब जन्म होता है तो नरक के जीवो को भी कुछ समय के लिए सुख का अनुभव होता है। लेकिन हम ऐसे अभागे है, ऐसे पावन परमेश्वर को सहजता से पाने के बाद भी तुच्छ दुखो को लेकर रोते ही रहते है। हमारे प्रभु रति और अरति दोनो अंधकारो से मुक्त है। वे न तो दुख में दुखी होते है और न सुख में खुशी। पाश्र्वनाथ भगवान के जीवन में एक तरफ कष्ट देेने वाला कमठ है तो दूसरी तरफ सदैव उनकी रक्षा-सहायता करने वाले धरणेन्द्र देव है। लेकिन प्रभु की दृष्टि में दोनो के प्रति एक समान करूणा एवं समभाव है। यही करूणा एवं सभी जीवो के कल्याण की भावना ही इन्हें तीर्थंकर बनाती है। नेमीनाथ भगवान ने भी जीव दया करके जीवो के प्रति करूणा का ही संदेश दिया है। भगवान महावीर के जीवन में भी इसी करूणा, दया एवं क्षमा के दिव्य दर्शन होते है। प्रभु ने कहा कि हमे बड़ा नही महान बनना चाहिए। हिटलर शायद बड़ा था लेकिन महावीर महान थे। करोड़पति शायद बड़ा होने के मार्ग पर है परन्तु भगवान, सज्जन और संत तो महानता के मार्ग पर चलते है। जो बड़े होते है उनका नाम लोगो की जीभ पर रहता है जबकि महान तो लोगो के हृदय में प्रतिष्ठित होते है। प्रवक्ता विजय जैन ने बताया आज दोपहर में नवपद पूजन सुरेशचंद बिरदीचंद शेखावत परिवार द्वारा किया गया । प्रभु पाश्र्वनाथ की नयनरम्य अंग रचना वीरेन्द्र जैन, हेमंत जैन एवं महावीर जैन के द्वारा बनाई गई। आगामी कार्यक्रम आगामी कार्यक्रम के अंतर्गत 10 सितम्बर शुक्रवार को संवत्सरी महापर्व मनाया जायेगा। इसके अंतर्गत बारसा सूत्र वांचन, चैत्यपरिपाटी, महाप्रतिक्रमण एवं संसार के प्राणी मात्र के प्रति क्षमापना भाव का दिव्य अनुष्ठान होगा।
