बागली (बेहरी ) इस बार होली पूर्णिमा के पावन पर्व पर भोम्या जी सरकार का पंचोपचार पूजन के पश्चात अखंड रामायण आंगनवाड़ी कार्यकर्ता राजू(सोलकीं) आरिया की पुत्री दीक्षा द्वारा रामभद्र मंडल पुजन किया यह कार्य पं. नरेंद्र वैष्णव द्वारा मंत्रोच्चार के साथ करवाया! इस बार
भोम्या जी हनुमान मंदिर पर रंगपंचमी को प्राकृतिक रंगों से होगा पुजन अभिषेक श्रृंगार,होली का त्योहार पूरे भारतवर्ष में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाते हैं। लोग एक दूसरे पर अबीर गुलाल और रंग डालते हैं। यह त्योहार उमंग और उल्लास को दर्शाता है। प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है और उसके अगले दिन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को रंग वाली होली मनाई जाती है। इस बार 28 मार्च 2021 को होलिक दहन किया जाएगा और 29 मार्च 2021 को होली का पर्व मनाया जाएगा। जिसे रंग वाली होली या धुलेंडी कहा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि रंग वाली होली को धुलेंडी क्यों कहते हैं, और यह परंपरा कब से शुरू हुई।
होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी मनाई जाती है। इस दिन लोग जमकर पानी और रंगो से होली खेलते हैं। धुलेंडी को धुरड्डी, धुरखेल, धूलिवंदन और चैत बदी आदि नामों से जाना जाता है। आज के समय में धुलेंडी का त्योहार एक दूसरे पर रंग और अबीर गुलाल डालकर मनाया जाता है, लेकिन पहले के समय में धुलेंडी का त्योहार बहुत ही अलग तरह से मनाया जाता था। उसी पंरपरा के नाम पर इस दिन को धुलेंडी कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग के आरंभ में भगवान विष्णु धूलि वंदन किया था। तभी से इस दिन धूलिवंदन यानि एक दूसरे पर धूल लगाने की पंरपरा शुरू हुई। एक दूसरे पर धूल लगाने के कारण ही इस दिन को धुलेंडी कहा जाता है।
पुराने समय में लोग जब एक दूसरे पर धूल लगाते थे तो उसे धूलि स्नान कहा जाता था। आज भी कुछ जगहों पर खासतौर पर गांवो में लोग एक दूसरे धूल आदि लगाते हैं। पहले के समय में लोग शरीर पर चिकनी या मुल्तानी मिट्टी भी लगाया करते थे। इसके अलावा पहले के समय में इस दिन धूल के साथ टेसू के फूलों के रस से बने हुए रंग का उपयोग किया जाता था और रंगपंचमी पर अबीर गुलाल से होली खेली जाती थी। वर्तमान समय में धुलेंडी का रूप बदल गया है, लोग इस दिन भी रंगपंचमी के उत्सव की तरह ही रंगों से उत्सव मनाते हैं
?️सुनील योगी














