देवास। देश के नए आपराधिक कानून ढांचे के तहत मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (MP High Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 111(4) के दायरे और इसके उपयोग को लेकर अहम स्थिति स्पष्ट की है। यह प्रावधान मुख्य रूप से ‘संगठित अपराध’ (Organized Crime) से जुड़ा है, जो पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) में इस स्वरूप में मौजूद नहीं था।
न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की एकल पीठ ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए धारा 111(4) के तहत लगाए गए आरोप को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के नए और कठोर कानूनी प्रावधानों को बिना किसी ठोस आधार के मनमाने ढंग से लागू नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के फैसले की मुख्य बातें (Key Highlights of the Order)
न्यायालय ने अपने आदेश में संगठित अपराध सिंडिकेट की सदस्यता से जुड़ी इस धारा के इस्तेमाल के लिए सख्त शर्तें तय की हैं:
- 10 साल का आपराधिक रिकॉर्ड अनिवार्य: धारा 111(4) का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब अभियोजन पक्ष यह साबित करे कि आरोपी के खिलाफ पिछले 10 वर्षों के भीतर ऐसे मामले दर्ज हुए हैं, जिन पर किसी सक्षम न्यायालय ने संज्ञान लिया हो।
- सिंडिकेट में सक्रिय संलिप्तता के प्रमाण: केवल पुराने मामले दर्ज होना काफी नहीं है, बल्कि आरोपी की किसी ‘संगठित अपराध सिंडिकेट’ में सक्रिय संलिप्तता (Active Involvement) के स्पष्ट प्रमाण होना भी आवश्यक है।
“एक ही समय के अपराध ‘निरंतर गतिविधि’ नहीं”
मामले के तथ्यों का गहराई से विश्लेषण करते हुए अदालत ने पाया कि आरोपी के खिलाफ बताए गए पुराने मामले एक ही समयावधि (Same time period) के हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक ही समय में दर्ज हुए कई मामलों को “निरंतर अवैध गतिविधि” (Continuous illegal activity) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
चूंकि इस मामले में धारा 111(4) के लागू होने के लिए आवश्यक तत्व पूरे नहीं हो रहे थे, इसलिए कोर्ट ने संगठित अपराध से जुड़े इस आरोप को कानून की दृष्टि में अस्थिर मानते हुए खारिज कर दिया।
नए आपराधिक कानून के लिए मार्गदर्शक फैसला
विधिक जानकारों के अनुसार, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस निर्णय को नए आपराधिक कानून (BNS) के तहत संगठित अपराध से संबंधित प्रावधानों के उपयोग पर एक ‘महत्वपूर्ण मार्गदर्शक’ (Guiding principle) के रूप में देखा जा रहा है। इससे पुलिस द्वारा इस गंभीर धारा के दुरुपयोग पर भी लगाम लगेगी।
इस महत्वपूर्ण मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वरुण मिश्रा ने पैरवी की। न्यायालय ने उनकी दलीलों को गंभीरता से सुना और फैसले का महत्वपूर्ण आधार माना।
















