देवास : देवास शहर के बीचों बीच प्रसिद्ध माँ तुलजा भवानी व माँ चामुंडा की टेकरी पर कल देर शाम एक लकड़बग्गा देखा गया। लकड़बग्गा शाम को सीढ़ी मार्ग ओर देखा गया, माता टेकरी पर दर्शन करने गए लोगों द्वारा उसे देखा गया व उसका वीडियो भी बनाया गया। ये लकड़बग्गा किधर की तरफ शहर के बीचोबीच आया फिलहाल इसका पता नही चल पाया है। देखें वीडियो
क्या होता है लकड़बग्गा
लकड़बग्घा विचित्र जंगली प्राणी है। वह विभिन्न प्रकार की बोलियाँ बोलता है। उसका ठहाका बहुत प्रसिद्ध है। आमतौर पर अच्छा भोजन पाकर वह अचानक ही जोर से ठहाका लगाता है। वनों में पर्यावरण की रक्षा में लकड़बग्घे का बहुत योगदान है। ये वनों के चक्कर लगाते रहते हैं। बीमारी से मरे जानवरों को शिकारी पशु नहीं खाते परन्तु ये बड़े सफाई से उन्हें चट कर जाते हैं। बाघ जाति के जानवर अपने शिकार का कुछ भाग खाते हैं और कुछ सड़ने के लिये छोड़ देते हैं। उस बदबूदार माँस का भक्षण लकड़बग्घे करते हैं। वन में लगे कैम्पों तथा घरों से बाहर फेंकी हुई जूठन और हड्डियों के टुकड़ों को खाने के लिये ये रात में आ जाते हैं। छोटे-छोटे टुकड़ों के लिये ये आपस में खूब लड़ते हैं इसीलिये इसे मैदानों और जंगलों की ‘गन्दगी साफ करने वाला क्रियाशील सफाईकर्मी’ कहा जाता है।

लकड़बग्घा हड्डियाँ तक चट कर जाता है। इस कारण इसका मल चाक जैसा सफेद होता है। इसे दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। ‘एल्बम ग्रसियम’ के नाम से इसे गिल्लड़, मस्से जैसे रोगों में प्रयोग किया जाता है। पूर्वी भारत में लकड़बग्घे की जीभ और चर्बी सूजनों और रसौलियों को बिठाने के लिये काम में लाई जाती है। अफ्रीका में इसकी चर्बी रोगग्रस्त अंगों पर मली जाती है। मिस्त्र में नीलघाटी के लोग दीर्घायु होने के लिये इसका दिल तक खा जाते हैं। इसे मनुष्य के लिये कई तरह से उपयोगी जीव माना गया है लकड़बग्घे दो प्रकार के होते हैं- धारीदार और चीतला। इसे अंग्रेजी में ‘स्ट्राइप्ड हायना’ और ‘स्पॉटेड हायना’ कहते हैं। संस्कृत में दोनों का नाम ‘तरक्षु’ है। भारतीय उपमहाद्वीप में धारीदार लकड़बग्घे जबकि अफ्रीका में चीतल लकड़बग्घे पाए जाते हैं।














