देवास। गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बची नरवाई (फसल अवशेष) को जलाना न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि यह किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का सौदा भी है। मप्र जन अभियान परिषद ग्राम विकास प्रस्फुटन समिति के अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह राजपूत ने किसानों को जागरूक करते हुए एक महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने कहा कि यदि किसान नरवाई का सही प्रबंधन करें, तो यह उनके खेतों के लिए “सोना” साबित हो सकती है।
जैविक खाद में बदल सकती है नरवाई
धर्मेंद्र सिंह राजपूत के अनुसार, नरवाई से बेहतरीन जैविक खाद तैयार की जा सकती है। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता (Fertility) बढ़ती है, बल्कि आने वाली फसल के उत्पादन में भी शानदार वृद्धि होती है।
कैसे करें नरवाई का सही उपयोग?
उन्होंने नरवाई प्रबंधन के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए:
- रोटावेटर का प्रयोग: नरवाई को जलाने के बजाय रोटावेटर चलाकर उसे बारीक टुकड़ों में काट लें।
- मिट्टी में मिलाएं: बारीक कटी हुई नरवाई को मिट्टी में मिला देना चाहिए, जिससे यह प्राकृतिक खाद का रूप ले लेती है।
- गहरी जुताई: खेतों की गहरी जुताई करने से नरवाई जमीन के अंदर दब जाती है और सड़कर खाद बन जाती है, जो जमीन की गुणवत्ता में सुधार करती है।
नरवाई जलाने के नुकसान
राजपूत ने आगाह किया कि नरवाई जलाने से दोहरा नुकसान होता है:
- पर्यावरण प्रदूषण: इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है जो स्वास्थ्य के लिए घातक है।
- जैव विविधता का नाश: आग लगाने से मिट्टी के भीतर मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीव (Micro-organisms) और मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं, जिससे खेत की सेहत बिगड़ती है।
किसानों से अपील
उन्होंने किसानों से पारंपरिक लेकिन हानिकारक तरीके को छोड़कर आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाने की अपील की। इससे न केवल अगली फसल का उत्पादन बेहतर होगा, बल्कि खेत की उपजाऊ शक्ति भी लंबे समय तक बनी रहेगी।
