• कुछ दावेदारों को छोड़कर अधिकांशत: के पति या परिवार के राजनेता की वजह से वह दावेदार…!
देवास। सर्वविदित है कि आगामी नगर निगम परिषद में देवास महापौर का पद सामान्य महिला के लिये आरक्षित किया गया है। इसके पीछे का भाव महिला सशक्तिकरण ही है।
बीते वर्षो में राजनीति हो या अन्यà कार्यक्षैत्र, महिला सशक्तिकरण की बातें जोर शोर से की जाती रही है। लेकिन धरातल पर चुनाव के संदर्भ में ही बात की जाए, तो कहां नजर आता है कि कोई राजनैतिक पार्टी किसी योग्य, साक्षर, सक्षम, स्वविवेक से निर्णय करने वाली महिला को महापौर प्रत्याशी के लिये आगे लाकर उसमें नेतृत्व की संभावनाएं तलाश रही हो।
आजकल की संकुचित राजनीति या प्रचार प्रसार के माध्यमों से परे, बिना किसी दुराभाव के कांग्रेस की और से घोषित प्रत्याशी श्रीमती विनोदिनी रमेश व्यास का ही आकलन किया जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है, अव्वल तो यही कि पीछे रमेश व्यास नहीं जुड़ा हो तो उनकी अपनी सार्वजनिक या राजनैतिक पहचान शुन्य ही नजर आती है। खेर श्री मति विनोदिनि व्यास एक सीधी सुलझी हुई ग्रहणी है कहा जा सकता है की जिन्होंने अब राजनीति में हाथ आजमाया है लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके पीछे उनके पति रमेश व्यास है।
भाजपा में भी लगभग यही स्थिति है। महापौर प्रत्याशी के लिये भाजपा में जितने भी दावेदारों के नाम सामने आए थे या आ रहे है। उनमे से अधिकांश के पति या परिवार का व्यक्ति या तो नेता है या उनका नेताओं से सीधा जुड़ाव है।
दोनो पार्टियों में नेत्रीया भी मौजूद है जिन्हे राजनीति का अनुभव है।
देखना होगा कि कांग्रेस के ग्रहणी महिला को महापौर प्रत्याशी घोषित करने के बाद भाजपा किसे अपना महापौर पद का प्रत्याशी घोषित करती है क्या वो भी एक ऐसी ही एक महापौर प्रत्याशी होगी या एक ऐसी नेत्री होगी जो अपने निर्णय किसी के बल में ना आकर स्वयं ले सके।
अगर एक ऐसी महिला महापौर चुन कर आती है जो की एक ग्रहणी है और उन्होंने अपने पति या परिवार के किसी व्यक्ति के राजनीति में होने के कारण महापौर की उम्मीदवारी की हो वह किसी भी पार्टी से हो, कोई भी महिला जीतकर आ जाए। अन्तत: सत्ता की चाबी तो पति के पास ही रहेगी। क्या वह स्वविवेक से निर्णय ले पाएगी, कार्य कर पाएगी। चुनाव में महापौर या पार्षद पद के लिये उम्मीदवारी नहीं, देखने में तो यहां तक आता है कि महिलाए मतदान के लिये भी स्वविवेक से निर्णय नहीं ले पाती है। अधिकांशत: अपने पति की राय अथवा राजनैतिक पार्टी से सम्बद्धता के अनुसार ही मतदान करती है। इन तमाम बातों, बिंदुओं पर गौर किये बिना महिला सशक्तिकरण या राजनीति में महिलाओं को आगे लाने की बाते करना ढकोसला मात्र ही परिलक्षित होता है। इस विषय पर ऐसा नहीं चल सकता कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और…।














